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सदा तकता रहा

 घोर काली रात बदरा आसमां रोता लगा  सोचता तुझको रहा  और मन यहाँ विचलित रहा  दर्द की रातें कराही या अगन हो देह की  मांगता तुझको रहा  और मन इरादा कर गया  एक तु जो तान छोड़े  या तेरी मजबूरियां  ये बजूं तुझ तक रहा  और मन सहमता ही गया  बेमेल से जो हम मिले हैं  अब दूरियां सहती कहाँ  हक़ दिया है यूँ तुझे ही  और मन सदा तकता रहा 

दिन तेरे बिन

 जो दिन तेरे बिन गया  ठहरा सा जहाँ लगा  रातों की ख़ामोशी सपनों का जहाँ ढला  आजमाऊँ किसको मन मेरे  द्वंदों की आजमाइश में  रूकती  सांसें ढूँढती थमता सा समय लगा  साथ नहीं माँगा कोई  विकल्पों की तलाश नहीं  मन घोर अँधेरा फैला था  ख़ाली सा जहाँ लगा  तेरा जाने तु हमदम  गुजरा अब मेरा नहीं  ख़ामोशी तेरी तु जाने  मुझको मेरा डर रहा 

शून्यता है जिंदगी

 एक हिसाब है जिंदगी  जिसे न तु कर पायी  न मैं कर पाया  एक बहम है मन का  न तु समझा पायी  न मैं समझ पाया  खाली से दरीबों में  भटका है मन अक्सर  न तु सजा पाया  न मैं सजा पाया  एक पहाड़ है जिंदगी  न तु चढ़ पाया  न मैं चढ़ पाया  एक किताब है मन की  न तु पढ़ पाया  न मैं पढ़ पाया  सूखी सी नदी में  बहा है अक्सर  न तु किनारे आ पाया  न मैं पार कर पाया  एक शून्यता है जिंदगी  न तु भर पाया  न मैं भर पाया  एक आस है मन की  न तु समझ पाया  न मैं समझा पाया 

समां गयी

 कोमल कमलदल सकुचाई सी  पीर हमारी मिली मुझे  समां गयी उर अधरों से  सार समर्पण सीखा गए  उंगुली हाथ हथेली छुई  पथि वो आटा मेरे लिए  फूल मुलायम पंखुड़ियों सी  हाथ वो रेखा बना गए  कागज़ की कोई नाव तैरती  डूब पहाड़ समुन्दर हम  ज्वार थमा निशान से छूटे  रचते रहे हैं मेहँदी हम  समय सदा से काम ही रहा है  चितचोर रहा मन मीत मेरा  दो पल की सब खुशियां बाँटी और गीत लिखना सीखा गए 

मेरा होकर

 धरती खुशबू साथ लपेटे  सज आता है मेरे लिए  लोक लाज की देहरी लांघें  चल पड़ता है साथ मेरे  खुद उम्मीदें घर में रखकर  फिरता संग है राह मेरे  सुहागिन का सिन्दूर चढ़ाये  करता समर्पण मेरे लिए  सपने जहाँ कठिन से लगते  कदम बढ़ता साथ मेरे  खुद की खुशियां छोड़ के आता  दुनिया रचता साथ  मेरे  अहसासों की नाव खेवता  मुझे तैराता मेरे लिए  दुःख का मेरे साथी बनता  सुख की सारी प्रीत लिए  मेरा होकर मुझमे खोता  खुद की न परवाह किये 

थोडी सी

थोडी सी कुछ धूप पोटली  भरकर रख दूँ नाम तुम्हारे ताखे रख दूँ उजले जुगनु  यादों की एक ग्येड बाँध लूँ चाँद रहा है दूर सदा से  धरती छोर उम्मीद लगाये जल जाये वो जुगनु बन लूँ  धूप पोटली काखे रख दूँ मन्दिर की एक मूरत है तु  पुजुँ तुझको या सांसे रख दूँ जीवन तेरे नाम लिखा दूँ  थोड़ी अपनी पहचान बचा लूँ मन में रमा समां है तू ही  आवाज़ मनों की लौट के आये  शब्दों को परिभाषित कर दूँ  तुझमे अपनी साँस बसा दूँ 

दिन

यूँ तो चेहरे लाख हैं  पर भीड में अपना सा तु चल पडा हूँ साथ तेरे अब सफर मंजिल है तु आसमां मांगा नही है हम रहें धरती सदा आस तुझसे बँध चुकी है अब सफर मंजिल है तु हर समय जो साथ है वो याद बन आती रही देख सब सपने चुका हूँ अब सफर मंजिल है तु रास्ते सब जुड चुके हैं कुछ दूर यूँ चलना सही हो फतह ये तय हुआ है अब सफर मंजिल है तु

अनायास

एक गीतों की बानगी सांसो ने लिखी कहीं  हाथों हाथ मिले मगर अहसासों की बन्दगी  शामों की फिजाओं में मनों की खामोश स्वीकृति तन मन दोनो एक हुए दुनियां की परवाह नही लबो के रंग मिल गये हमजोली परिधानों की छुकर बार बार गये वो कोमल स्पर्श पंखुडी उत्तापों के तापों पे हिलोर लगायी बानगी झूले पर्वत साथ समुन्दर समा गयी सब धारनी  सीमित समयों ने छेडी है सीमित तान मल्हार सी बाहों संग समा बैठी है कोमल तन की अगडायी दो से एक हुए मन तर्पण संग बडी अतुरायी भी खुद को खुद के साथ समाकर खुद से मिली दिवानगी

मेरी गंगा मुझ में बहकर

मिलने की दुश्वारी होती  म्यानें ही खुल जाती हैं  भाव बढ़ा त्योरी चढ़ जाती  बात बात अड़  जाती है  स्नेह समर्पण साथ रखे  हम बात बात लड़ जाते हैं  तय किये हुई कुछ बातें होती  मिलने पर आ जाती हैं  देर हो गयी झट से आओ  गुस्से से कह जाती है  रोष जोश भावों में दिखता मन में पिघल ही जाती है  एक नज़र नजरों से मिलती  कथा पलट सी जाती है वो मुझमें खो जाती है  और साँसें थम जाती हैं  कहती है सब करो जो ठाना गीत मिलन के गाती है  साँसें देकर जीवन देती  मुझमें घुल सी जाती है  हो समर्पित मुझमें बहती  मेरी गंगा  बन जाती है  कर पवित्र एक धाम रचाती बंधन जोड़ सी जाती है  पल से दिन और दिन से हफ़्ते  सालों की कशिश मिटाती है   मेरी गंगा मुझ में बहकर  प्राण वायु दे जाती है  जन्मो का एक बंधन जोड़ती  जीवन दर्शन देती है  मेरी गंगा मुझ में बहकर  प्राण वायु दे जाती है 

तुने संग आकर

बुझती हुई चिता सा राख भर था जीवन एक तुने साथ आकर जीना सीखा दिया है खाली पडा मकां सा विरान था ये संकल्प एक तुने साथ आकर सांसों हवाऐं दी हैं बँधता हुआ है पुल जो आशाऐं बँध रही ही एक जीतती सी कोपल अब साथ बढ रही है है ये सफर कठिन सा पर राह दिख रही है मंजिल की आस किसको एक साथ ढूँढती है उलझी हुई सी तान सा वे-ताल था ये जीवन एक तुने संग आकर सुरताल भर दिये हैं बेशब्द बे-मुर्रबत बे-आस था ये जीवन एक तुने संग आकर अमरत्व भर दिया है जीने की वजह तुम हो मरने का ढोंग तुम पर इस शाम की निशा का ढलती सी रात तुम हो