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अपनापन

वो जो तु बस निभाने को बाँट लेता है सूनापन  तेरी मेरी सीमाओं का  बस वो ही है अपनापन  आशायें कहाँ हज़ार थी  जता देता हूँ अवारापन इन अधूरी कहनियों का ये ही है वो अपनापन  दूरियाँ का ये लगाव था  खिंचता रहा वो भोलापन सबके बीच की खींचतान का ये ही है वो अपनापन  हर वक़्त मन में शामिल रहा वो जो है अपना ख्यालीपन  वो जो जगज़ाहिर न हुए  ये ही है वो अपनापन 

बन्धन

लहर हूँ लौट के आऊंगा नदियाँ हूँ बहा ले जाऊँगा  तुम मन कहीं और लगा लो याद हूँ पास बुला लूँगा  नजर हूँ देख के आऊँगा  साँस हूँ साथ में जाऊँगा  तुम खो जाओ गुमशुम राहों में आवाज़ हूँ पास बुला लूँगा  हिमालय हूँ उठ ही जाऊँगा  पहाड हूँ दरक भी जाऊँगा  तुम कोशिशें दूर रहने की हज़ार करो पेड़ हूँ ज़मीं का बन्धन न भूल पाऊँगा 

किताब

सम्भाला है अपने से ज़्यादा  जीवन की हर किताब को  यादों की वो मधुर स्मृति  मन मे घर बनाती रही  किताबों के कुछ पन्ने  जीवन की तरह रहे  पलटे कई बार पर बिनपढें ही रहें  तु भी उन्हीं पन्नों मे  खोयी कोई कहानी रही झकझोरती गई कई बार  पास रहने से कतराती रही  जिया है अहसासों को हर उस किरदार में मूक बनकर ही रहा हर बार और यूँ हारता रहा 

तलाशता रहा

जब सफ़र ख़त्म होने को था   वो यूँ  मकां बनके आया  कोई मंज़िलों को बढ़ चला  कोई घर तलाशता रहा  मंदिरों में घंटी की आवाज हर बार पास बुलाती रहीं  ढेंठ अक्खण धुनि रमायें रहा  मन था कि तलाशता रहा  शाम के कुहरे मे रास्तो की कोशिश हर बार सपनों को भटकाता रहा कदम बहुत हुऐ  तेरे घर चलने को डगमगायें हाथों से कुण्डी तलाशता रहा 

रंग चढ़ा रहा

मनों के रास्तें जो अब विरान रहें  किसी के क़दमों की थाप आती रही  ख़ाली सुनसान पड़ी उन जगहों से  कोई नज़र हर बार झांकती लगी  उन उदास रास्तों के छिटके फूलो में  एक मुरझाया सा फूल हँसता मिला  हज़ारों सम्मलित रंगीन महफ़िलों में उसकी सादगी का रंग अब भी चढ़ा रहा पेड़ों से गिरते पत्तों को देखा जब कभी अपनो की वो तलाश हवा मे उड़ाती रही ठिकानों की भटकती तलाश अन्धेरे में  हर बार उसकी रोशनी में चकाचौंध रही 

वो कुरेदा नाम

सपनों को लिखता हूँ  यादों को बुनता हूँ  लम्बा तेरे बाद का शीतकाल यादों को ओढ़कर सोना चाहता हूँ    उगाये गये उन पेड़ों पर  फिर वो नाम कुरेदता हूँ  शिलान्यास तेरे अवशेष बन जायेंगे  वो दर्द ज़िन्दा रखना चाहता हूँ  छिटके गये उन बीजों पर  फिर कोई भारी पत्थर रखता हूँ  रिश्ते सब भुला भी दिये जाय तो क्या वो अपनापन ज़िन्दा रखना चाहता हूँ 

तु खोया नही

तु सुनता भी है  जताता भी है  मानता भी है  भागता भी है  दूरियों मे  हो पर पास है  तु छुपता तो है  पर ओझल नही  नज़र मे रखता है  फेर भी लेता है झकझोरता भी है  खामोश भी रहता है  खो जाता है  तो मिल भी जाता है  तु छुपता भी है  पर खोया तो नही 

खामोश है

बदलते हर पन्ने पर चेहरे वो अंजान हैं किताबों के ढेर मे एक कहानी गुमनाम है  मेंढों की क़तारों पर उगी कुछ घास है  अनाजों के ढेर में बीज कहीं दबा सा है   पथरीलें रास्तों पर ज़मीं कुछ शैवाल है  बरसात के शोर मे गाँव अब खामोश है  तेरी ढीठ आदतों पर मेरी वो बदमाशीयां है  जानता तु भी है मैं भी  बस मन है कि खामोश है     

बची रही

तांकता हूँ उम्मीदों के आसमान को  क्या पता बरस जाये वो नीर उसके ठूंठ बन जाने से पहले  वो कुछ जड़े हरी बची रहीं  सोचता हूँ उम्मीदों के मंज़र को  क्या पता फिर दोहरा जाय वो शाम उसके ढल जाने से पहले  वो कुछ यादें ताज़ा बचीं रहीं  देखता हूँ अरमानों के उस शून्य को  क्या पता फिर नज़र आये वो तारा  उन बादलों के आने से पहले  वो कुछ छापें मनों पे लगी रहीं 

सबका मान है

किसी की दुवाऐं लेता हूँ  किसी की बद्दुआएँ लेता हूँ  सबके लिए मन से नही  अक्सर सच के साथ होता हूँ  कोई चुपके से मन में रखता है  कोई मक्खी की तरह फैंक देता है गिला किसी से भी नही  अक्सर भावनाओं को एकतरफ़ा रखता हूँ  कोई चुराके नज़र सम्मान करता है  कोई लगातार उपयोग करता है  मन जानता सबकुछ है खामोश सबका मान रखता हूँ