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डरता कौन है

मंचानों से उड़ना कठिन तो न था पर पंखों को खुद ही तोड़ा है  बिखरने से यूँ तो डरता कौन है  सामना मुश्किलों से उतना भी न था  पर बाँधों को खुद ही खोला है  बहने से यूँ तो डरता कौन है  दर्द भागती यादों का नासाज़ तो न था  मन खुद ही उसे परदेश छोड आया है अकेलेपन से यूँ तो डरता कौन है  ज़िक्र अपनों का महफ़िलों मे छुपा तो न था पर मन को खुद ही एकाकी बनाया है  परायों में तेरी बातों से डरता कौन है 

अपनी दुनियाँ

उन रास्तों पर चलता रहा  ये सोचकर कि तु साथ है मंज़िलों की तलाश नहीं  कभी ख़्वाबों में जीना अच्छा है  किसी से कुछ चाहा नही  ये सोचकर कि तु अपना है हमसफ़र की तलाश नही  कभी ख़्यालों में रखना अच्छा है  शहरां से आजकल दूर ही रहा  है एक छोटी सी दुनिया अपनी भीड़ में यूँ तो जीते हैं सभी  कभी अकेले जीना भी अच्छा है 

ख़ाक जमीं

तमन्नाओं की ख़ाक ज़मीनों पर कुछ उम्मीदें अब भी पलती हैं ख़ामोश हों फिजाएं तो क्या वो चिड़ियाँ अब भी चहचहाती हैं शंकाओ के जलते अंगारों पर औंस की बूंदें अब भी गिरती हैं रोया हो हलधर मन तो क्या वो फसल अब भी लहराती है विफलता  के भारी बोझों पर आस के बीज जमीं ढूंढ लेते हैं कठिन ही रहा हो रास्ता तो क्या मंजिल अब भी पास बुलाती हैं

गुमनाम कहानी

कभी सोचा है बरखा को कि धरती पर गिर रहे आंसू छुई जो औंस आखें नम सी उतर आयी वो एक तस्वीर सी जुबां खामोश करने को कि फिर एक सर्द हवा आयी उड़ाकर ले गई सब आंधी पतझड़ में जो वो बनके याद आयी सिमटती यादों ने खोया है वो 'मन' की सादगी में सच्चाई कलम बनकर वो जब  लिख बैठा कहानी गुमनामियों की रच डाली 

पास देखता हूँ

कभी मुष्क सा छूकर जाना स्नेह की आशा में घुल जाना कभी दरवाजे पे मूरत बन जाना तुझे देखता नहीं बस सोचता हूँ कभी मानस पर छाप छोड़ना गीत ग़ज़लों में घुल जाना कभी किताबो में बस जाना तुझे सोचता नहीं गाता हूँ कभी सपनो में आ जाना ख्यालों में रच बस जाना कभी पहाड़ो में तुझे देखना तुझे गाता नहीं पास देखता हूँ 

जो एक बार

यूँ न हुआ कभी कि  दोस्तों में दुश्मन मिले हों वो लोग और ही थे,  जो एक बार पास लगें मन से दूर हो न सके यूँ तो नाराज़गीयां कभी  दोनों तरफ भी रहीं होंगीं  वो फसानें और ही थे,  जो एक बार छेड़े गये मन से कभी भूलाये न गये यूँ न हर बार यादों की सुनहरी रवांनीयां रही होगी  वो पल कुछ और ही थे, जो छूकर गयी एक बार  मन के रुबरू महक बन गये

प्रेम के गीत

नदियों नालों झरनो से  जब आवाज़ सुनायी देती है  यादों की विरान स्मृतियों में  कोई मनन अपना सा लगता है  गुमशुम नज़रें  जब स्नेह रचती है  मैं  मधुरिम प्रेम के गीत  लिखता हूँ खेत पहाड़ों खलिहानों से  जब तीतर तान लगा बैठा हैं  सूनसान पड़े उन ख़ाली राहों में वहम की कोई कदमचाप सुनी है घूरती मुस्कुराती वो नज़र लगी हो  मै मधुरिम प्रेम के गीत लिखता हूँ  मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों से  जब घण्टे घड़ियालों की नाद बजी है तपते पत्थर के कंच कणों मे  आशा की कोई चमक उठी हो  सच्चाई से सादगी वाली आश लगी हो मै मधुरिम प्रेम के गीत रचता हूँ 

तस्वीर

नदी सा चुपचाप बहता रहा  कभी समुद्र सा शान्त दिखा उमड़ते गरजते बादलों में आशाओं का पहाड ढका रहा  सबकुछ तो वोही है  कोने मे किसकी कमी है चहकती बसन्ती सुबह में ये कौन अलसायी बेल है  दीवारों के चित्रों पर धूल है साफ तस्वीर वो किसकी है मन के शान्त किसी कोने में  वो जमती बर्फ़  किसकी है 

यात्रा के वृतांत

दुनिया की दौड़ मे  कुछ पीछे रह गया कुछ छुटा सा लगा  तो कुछ छोड़ दिया वरबस उलझे शहरां मे  कुछ द्वन्द यूँ  रहा  कुछ भूल सा गया  कुछ भुला सा दिया  यात्रा के वृतांतो में पड़ाव कुछ यूँ आये  कहीं सुस्ता से लिये कहीं सरपट दौड़ लिये  महमां शहर मे यूँ आयें एक बस्ती बसती लगी  कुछ ख़ानाबदोश निकले कुछ शरणार्थी बने रहे 

अपनापन

वो जो तु बस निभाने को बाँट लेता है सूनापन  तेरी मेरी सीमाओं का  बस वो ही है अपनापन  आशायें कहाँ हज़ार थी  जता देता हूँ अवारापन इन अधूरी कहनियों का ये ही है वो अपनापन  दूरियाँ का ये लगाव था  खिंचता रहा वो भोलापन सबके बीच की खींचतान का ये ही है वो अपनापन  हर वक़्त मन में शामिल रहा वो जो है अपना ख्यालीपन  वो जो जगज़ाहिर न हुए  ये ही है वो अपनापन