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जो भी हैं

तुने भी कभी चुपके से नीड़ को बनते देखा होगा कभी सहमी सी नज़रों में कुछ ख़्वाब उजड़ते देखा होगा   सपनों की ताबिरों का कोई महल उजड़ते देखा होगा तुमने भी कभी मुझ जैसा  तुझको खोते देखा होगा  हम जो भी हैं हम जो भी थे सम्मानों से साथ रहे  कभी पास रहे कभी दूर लगे कभी मर्यादित से बच निकले  मीलों के उन पत्थरों सा  खड़े रहे यूँ तांकतें रहे  जो चला गया वो लौटा क्या जो ठहरा वो भूला क्या ? 

कोने मे

जब जीवन संघर्ष रहा  फ़सल अधपकी जल गयी  सूनसान किसी कोने में  बीज पड़ा मुस्कुराया है  जब वनाग्नि में सब भष्म हुआ  मन मन्दिर सब आहत हुआ धरती के किसी कोने में कोंपल खड़ी मुस्कुरायी है  जब अन्धेरों ने राह घेर ली  स्याह कालिमा छायी थी  जंगल के किसी कोने में जुगुनु ने राह दिखायी थी  फिर समय ने परीक्षा ली है  फिर अन्वेषण ने पुकार है  कोई रचियता किसी कोने में मन्द मधुर मुस्कुराया है 

वो चेहरा

जहाँ दूर तक नज़र गयीं तु भी उन  चेहरों में था  खामोश रहा है जब भी जीवन  तु बोलते  उन उद्दगारों में था ।। जहाँ सुस्ता गया समय भी  तु भी उन राहों में था  सुनसान रहा ये जीवन जब भी तु निशब्द उन अहसासों में था ।। जहाँ उमंग उत्साह रहा है तु उन पलों का परिचायक था पाया कुछ खोया जब जीवन में तु कहीं किसी कोने में खडा दिखा है ।।

सार

जो मुश्किल था पास हमारे  सब उत्तर तु पाले है  जहाँ सफ़र खामोश हुआ था  चीख़ती कुछ तो यादें हैं  हर रिश्ते का सार बताते  तेरे शब्द सम्भालें हैं जो अचेतन था मन में हमारे  वो मूरत तु ढाले है जब भी रहा वो अशान्त चिन्तन  शान्त किया तेरी यादों ने हर आशा की साँस बँधाता  अपना खोया सावन है  

मैं

बिन रिश्ते और सम्मान से दो कदम साथ चलना चाहता हूँ  जी कर भी हार जाऊँ वो अभिशाप होना चाहता हूँ  सूने पड़े किसी मन्दिर में  टूटा पड़ा वो घंटा होना चाहता हूँ  वन देवता के टूटे महल का  वो खंडित पत्थर होना चाहता हूँ  हिमालय  की तलहटी में खोती  वो कटती पिटती डगरिया होना चाहता हूँ  निशाँ बचे हो जिसके बहने के  वो सूखी नदिया होना चाहता हूँ  स्नेह की आधी अधूरी ही सही  वो अधखुली किताब होना चाहता हूँ  खो गयी हो दुनिया की भीड़ में  उस कुंची की एक चाबी होना चाहता हूँ  हाँ मैं मैं होना चाहता हूँ  मै यूँही तुझमें खोना चाहता हूँ 

सदियां हो गयी

वो दरवाजा जहाँ ठिठक जाता था उस एक उठती नज़र के लिए लगा की सदियां हो गयी और वो किताबें इतिहास हो गयी वो रेलिंग के सहारे छुपने की कोशिशें उस गुस्से को दबाने के लिए लगा की सदियां हो गयी और वो किस्से कहानियां हो गयी वो बातें जिनमें तर्क जी कमियां उस चेहरे की भाव को जानने के लिए लगा की सदियां हो गयी वो आदतें भावनाओं में तब्दील हो गयी 

दूर थे

कुछ ख्वाइशों का खेल था कुछ तक़दीर की बानगी कुछ पास आये दूर होकर दूर थे जब पास थे कुछ तेरे लोगों की साजिशें कुछ उपजाए थे बहम कुछ विश्वासों का जोर था दूर थे भूले नहीं कुछ मनों को जोड़ता कुछ  सीमाएं टूटती रही कुछ कदमो का तेज चलना दूर थे भूले नहीं 

संगम

तेरे अनजान अपनेपन में सम्वेदनाओं की कमी न थी  यूँ तो संवाद सीमित रहा  यूँ तो रिश्तों मे बँधे नही  अनगिनत उलझनें हों सही सोच तुझ तक जाती रही  यूं तो कभी विचार शून्य रहा यूँ तो कभी वो बूँद गिरी नही  देखा है कुछ सूखे संगमों को हम  बहती दो नदीयाँ ही सही यूं तो कभी अचानक उमड़ती रही  यूँ कभी चुपचाप शान्त ठहरी रही 

हम भी हैं तुम भी हो

काग़ज़ के तहख़ानों से कुछ याद समेटें निकली हैं  पीपल के सूखे पत्ते और  कुछ सकुचाई कोंपल हैं  सूखे ख़्वाबों में भी सुन्दर कुछ गीतों की खुशुबू हैं  हम भी हैं और तुम भी हैं साथ वो ज़िन्दा यादें हैं  यादों की उस पोटली में अनगिनत कुछ कहानियाँ हैं शुरु हुई कुछ ख़त्म नही हैं कुछ दबीं जबां ने कही नही हैं  कहीं थमीं हैं हाथ अंगुलियाँ  कहीं अलसाये होंठ थर्राते हैं  हम भी हैं और तुम भी हैं  साथ वो यादें ज़िन्दा हैं 

वो बचपन

हर देहरी पर फूल चढ़ाता  वो बचपन जिया है हमनें  हर घर आबाद रहे ख़ुशियों से उन गीतों को गुनगुनाया है हमनें गैंहू की लहराती फ़सलों सा वो बचपन जिया है हमनें पुकारते सरसों की पीत्तिका से  उन तितरों को सहलाया है हमनें  दवाग्नि से बूरांस खिले देखें हैं  बु्ग्यालों के मख़मल में हमने  ब्ह्मकमल के जज़्बाती दरबारों में  फ्योली सा जीवन जिया है हमनें