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कुछ भी नही

कब भीड़ खड़ी करनी थी   कब वो मक़ाम छूनें थे विस्तार जीवन का इतना हो स्नेह की छोटी सी क़तार हो  और तु उसमें शामिल हो  कब आवाज लगानी थी  कब आँखों में रहना था  देखना दूरियों मे इतना हो  कि मीलों नज़र जायें  और वहाँ बस तु ही शामिल हो कब पा लेना  है सबकुछ कब दुनियाँ में घूम जाना था इतनी उम्मीदों की ज़मीं रहे  कि बस खो जाय कुछ तो उस खोने में तु शामिल न हो 

शाम लगी है

जब भी बादल घिर आये हैं यादों के मंजर लौटे हैं बरखा की बूंदें तरसाती तेरे जैसी शाम लगी है अब भी पंख पखेरू चुप थे अलसायी बेलों के नीचे चिड़ियों ने चहचाना छोड़ा कोलाहल सी शाम लगी है जब वो उत्स गिरे थे धरा पर निष्ठुर मन पर चोट लगी हैं नदियों ने बहना तब छोड़ा हिमगिरि पर जब शाम लगी है

तु मुडा ही नही

दायरों मे कहीं जब भी आया कोई मौन कहता गया सोच तुझ तक गयीं बीच खूँटे में लटका रहा दरबदर  मन का विश्वास है फिर भी थमता नही  ग़ैरों बनकर  कभी जब भी आवाज दी  मौन लिखता रहा याद तुझ तक गयीं अंगुलियों के निशाँ यूँ मिटता  रहा  दौर यादों का  देखा तो  थमता नही खाली कोनों से किसने नज़र फैर दी यूँ लगा पास से कोई गुज़रा सही  असर झुकती आँखों  बढ़ता गया  दूर जब से गया तु मुडा ही नही 

कशमकश

ज़मीं में धँस जाऊँ या की उग आऊँ  कशमकश है जीवन, कोशिशें कब हारी हैं खुद से संघर्ष करूँ या दूर भाग जाऊ  कश्मकश है जीवन, लडना कब मना है बढता, दौड़ता रहूँ या कि थम जाऊँ  कशमकश है जीवन, सोच कब रुकी हैं  चाहूँ न चाहूँ या कि विरक्त हो जाऊ कशमकश है जीवन, समर्पण कब हारा है रिश्ते हो न हो या कि एकाकी रहूँ  कशमकश है जीवन, स्नेह कब भूला है 

दौड़ दौड़

कब तुझसे दूर रहा ख्याबों में कब तू दूर रहा यादों से मृतृष्णा है जीवन की दौड़ दौड़ भरमाता हूँ कब तुझसे पास यथार्त रहा है कब तू पास रहा है मन के जिद है उन संघर्षों की दौड़ दौड़ भिड़ जाता हूँ कब तुझसे कोई नाता है कब तूने  मन से माना है शरारतें है अल्हड़ता की दौड़ दौड़ खो जाता हूँ कब तुझसे कोई आशाएं हैं कब मन ख्वाब देखना छोड़ा है सपने हैं सपनो का क्या दौड़ दौड़ मुड़ आता हूँ

तु सदा

ये अठखेलियाँ भी अच्छी हैं  अजनबी इस वहम की  जो साथ में चला नही  वोही साथ में रहा सदा  ये पहेलियाँ भी अच्छी हैं  अनसुलझे इस सम्बद्ध की  जो कभी अपना था नही  वोही रिश्तों में रहा सदा  ये सिसकियाँ भी अच्छी हैं  अनकहे इस लगाव की जो कभी आँखों से था नही वोही आँसुओं मे बहा सदा 

तेरे मेरे

खाली रस्तों पर दौड़े हैं  तेरे मेरे बीच के नाते  कच्चे डोरों मे उलझें हैं  तेरे मेरे बीच के धागे  गहरे घाव बना बैठे हैं तेरे मेरे भाव के चेहरे  रंगों में बेरंग रहे  हैं तेरे मेरे बीच के साये  दूर कहीं जाकर बस बैठे तेरे मेरे बीच के रिश्ते मन मन्दिर पर छाये रहे है तेरे मेरे बीच के वादें 

जब भी

जब भी यादों के कोनों से  कुछ झुरमुट झर्रायें हैं हँसता है कोना वो घर का  जो अब भी समेटे तुझको है जब भी बातों के तानों से  कुछ शंकायें जन्मी हैं  हँसता है कोना वो मन का  जो अब भी समेटे तुझको है  जब भी रास्तों के काँटों से कुछ खरोंचे चुभती हैं हंसतीं है पीड़ा वो मन की जो अब भी समेटे तुझको है जब भी निगाहें मन पर कोई घाव बनाती जाती हैं हँसते  हैं वो खाली कोने जो अब भी समेटे तुझको है   जब भी खाली दरवाज़ों पर कुछ आवाज़ें लगती हैं  हँसती है आशायें मन की जो अब भी समेटे तुझको है

तु जब गया

ये वो पड़ाव है जहाँ तु ठहरा नही  रुका तो हूँ पर नज़दीकियाँ नही  हँसती सी कोई बयार चल निकली  तेरे साथ यादों की ताजगी बह निकली मेरे होने का अहसास हो ये तय है तेरी तरह जाने पर  दुख न हो कहीं  ये हक़ तुझतक रहें मर्यादा की सीमा में  यूं तेरे साथ मन की ख़ुमारी चल निकली  यूँ तो भटकती रही हैं ये ज़िन्दगी  और पाने के नाम पर खोया है सभी जाने को तो तु भी गया पर  लाखों यादें समेटे है ज़िन्दगी 

उँची सी आशायें

ये जो ऊँची सी आशायें हैं न! वहीं तो रिश्तों की निशानियाँ हैं  ‘नींव का पत्थर’ रहूँ मैं तेरे बुलन्दियों के जहान की  ये जो गुमशुम सा लगाव है न! वहीं तो मर्यादाओं की सीमा हैं जुड़कर तुझसे रहूँ मैं सीमा तेरे स्वच्छन्द आकाश की ये जो अपनापन छूटता नही न! ये उन गुस्ताखीयों की माफ़ी हैं ग़लतियाँ भूल न सकूँ मै सच्चाई लिए उस शालीनता की