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झकझोर

 जब उत्ताप के ज्वार पर  बाँहों भींच लिया था तुमने  सांसों की रचती खुशबू पर  एक अधिकार दिया था तुमने  स्पर्शों के कोमल आलिंगन  रोम रोम हर्षाते हैं  यादों की मीठी शामें  तन मन झकझोर सी जाती हैं  जब सर्द हुई पंखुड़ियों पर  कोमल छुवन रखी थी तुमने  खुले केश के कानन पर  हक़ का निज़ाम दिया था तुमने  सांसों की बढ़ती गहराइयाँ  बाँध समय को देती हैं  चेहरे की वो प्रखर छवि  तन मन झकझोर सी जाती हैं  जब दोहन भौतिक तापों पर  विश्वास रिश्तों के रखे तुमने  अधूरे अनबने बंधनों पर  समर्पण का इतिहास लिखा है तुमने  आशाओं के बनते पूल  मिला मनों को देती है  गहरी नीवों पर बढ़ती राहें   तन मन झकझोर सी जाती हैं  हुआ है बंधन रिश्तों का  हुआ है रिश्ता अपनों से  आपको को अपने से पाना  द्वन्द यही जो लम्बा है  पाने खोने पर टिकी उम्मीदें  तन मन झकझोर सी जाती हैं 

अंतिम पाने का

चाह दबाकर बीच मनों के  लम्बी राह तकूँगा मैं  नंदी सा इंतजार करूंगा  एक तेरे आदेश का  आशा के कोलाहल मन में  मर्यादित मौन रहूँगा मैं  डुबकी बारम्बार करूंगा  मन तन भीग जाने का  सूने से इस परिवेश में  रचता शब्द रहूँगा मैं  जीते जी संघर्ष करूंगा  तुझको अंतिम पाने का 

कुछ साल

 दिनों दिनों से मन में रहती  बस तेरी खुमारी है  कुछ यादों में तु रहता है  कुछ मेरी तन्हाई है  समय क्षणिक बचा रहा था  फिर तु बरखा में भीगा है  कुछ पास रही वो खुशबू तेरी  कुछ तूने गले लगाया है  सालों साल तका है चंदा  फिर तु रोशन उजाला है  कुछ शामों की मंदम लौ है  कुछ तूने रूप निखारा है  कड़की बिजली झंझावात की   फिर तूने सबकुछ संभाला है  कुछ तेरी अपनी जिम्मेदारी  कुछ मेरा हक़ जाताना है  समय डोर पर बंधे हुए हम  जीवन रस्सा- कस्सी  है  कुछ तेरा है पूर्ण समर्पण  कुछ मेरा अधूरा रिश्ता है  आ ! बसा मनों में निश्चय हो  कुछ साल सुहाना जीवन हो  कुछ तु मुझमे खोया हो  और कुछ में तुझमे खोया हूँ 

एक जहां

उम्मीदों का एक जहां है पास मेरे बहती एक गंगा रमती है साथ मेरे लाखों कंकर पत्थर आये अवरोधों के आगोश लगाकर अमर कर गयी गीत मेरे उम्मीदों की आस नही थी पास मेरे जलधारा कोई नहीं समान्तर थी साथ मेरे लाखों पतझङ खुश्क हुए आशाओं के बसन्त सजाकर कोपल दे गयी ठूंठ मेरे उम्मीदों की साख कहां थी पास मेरे झूले मन के खाली झूले थे साथ मेरे  लाखों बार टूटे हिंङोले विश्वासों के  गले लागाकर घूम गयी एक शाम मेरे  उम्मीदो की कलम कहानी पास मेरे दूर सही एक रोशनी चलती साथ मेरे  लाखों बार अन्धेरा छाया सब दिशाओं से वो दीप पूंज सा अखण्ङ जला है ताप मेरे 

आत्मा का बंधन

 धुनि रमाये इंतजार की  उमड़ती बरखा साथ लिए  आत्मा का बंधन कर बैठा  जग के सब संताप लिए  एक परीक्षा खुद में देता  प्रश्न समान्तर मन में लिए  मांग संदूरी रची है जिसकी  उसके हर अहसान लिए  टुकड़े टुकड़े जीता जीवन  निभती कोई साँस लिए  हाथ पकड़ जो साथ चले हैं  उनसे ही हर आस लिए  छोर नहीं इस डोर का कोई  फिर भी सपने साथ लिए  जाने कब तक साँस चले  कब रिश्ते सब गुमनाम लिए 

अपूर्णता

 ये अपूर्णता है जीवन की  जो पूर्ण मुझे कर जाती है  सम्पूर्ण समर्पण आकांक्षा वो विश्वास बढ़ा सा जाता है   कुछ मिलता सा कुछ खोता सा  एक द्वन्द सदा से जीता हूँ  सालों के इस जीवन में  ये सार्थक साल समझता हूँ  स्नेह किया परिभाषित है  एक मारे डर के साये हूँ  जो पा सा लिया अमूल्य है  बस अब  खोने से डरता हूँ  एक कविता सा रचता सागर  एक यादों की परिछायी  एक मीरगतृष्णा सी जीवन की  मैं दौड़ लगाए बैठा हूँ  पथिक सदा लक्ष्यों तक कब है  कुछ राह सुहानी होती हैं  कुछ चलता है साथ साथ  कुछ जीवन की तन्हाई है  रे-मन  कहता निर्णय तेरा  साथ चुने या तन्हाई  छोटा सा ये मन हैं मेरा  छोटी तुझसे रुस्वाई  "हो अपूर्णता जीवन की  ये पूर्ण मुझे कर जाती है"  सम्पूर्ण समर्पण आकांक्षा तु विश्वास बढ़ा सा जाता है

सर्वस्व

 कभी समय की बात लिखूंगा  जो मेरा होकर तेरा है  बरसो तेरे संग जिया है  हर ख़ामोशी के लम्हों में  शाम सुबह और रातों दिन  ताँका तुझको झाँका है  तुझसे ज्यादा बार लिखा है  नाम तेरा कोरे कागज़ पर  चलती दुनिया संग तेरे है  मेरी दुनियां तुझ तक है  तुझसे ज्यादा बार रचा है  रूप तुम्हारा इस मन पर  सबके होते द्वन्द समय के  तू दो बातों पर रुक जाता है  मैं तो आखर लिख लिख भरता  खाली कोना इस मन का  होती हैं कुछ बंद खिड़कियां  मैं खुली किताब हूँ जीवन की  नहीं रखे मन रोशन्दा हैं  मैं रात अँधेरा जगता हूँ  गुणा भाग मेरा लक्ष्य नहीं है  सतत राह अजमाती है  मन की तेरे तु जाने साथी ! मेरा सर्वस्व तुम्हारा है  कभी समय की बात लिखूंगा  जो तेरे संग में बहता है  परवाह कहाँ कब कितनी तुझको  समय लिखेगा समयों पर 

तुझ ही तक

 किनारे पर ही चला हूँ हरदम  तटस्थता जीवन सार नहीं है  आर पार का द्वन्द नहीं है  जीवन की ये राह तुझ ही तक   स्नेह  चुना जीवन दर्शन  घृणा जीवन रह न पायी  समर्पण के सब भाव लिए  जीवन की ये राह तुझ ही तक  पाना खोना हिसाब नहीं है  साथ है जो वो जीना है  मंजिल की एक डगर लिए  जीवन की ये राह तुझ ही तक 

मनन

 वो समय भी क्या जो तु न हो  तुझे मन बिठा के काम हों  तु प्रेरणा वजूद की  मनन ये शाम रात हो  कुछ लिख दिया कुछ कह दिया  शरारतों के पार भी  जो कहा नहीं जो लिखा नहीं  मनन ये शाम रात हो कभी हंस लिया कभी सिसकियाँ  अहसास साथ साथ है  उदास पल जो कटा नहीं  मनन ये शाम रात हो कुछ बढ़ गए कुछ चल दिए  सफर में संग संग से  रह जो कटी नहीं  मनन ये शाम रात हो वो जीवन भी क्या जो तु न हो  गुजर गए कुछ साल हों  तु निशानियां सकून की  मनन ये शाम रात हो 

बचपन

 आ चल आ संग मेरे तु बचपन में ले जाऊ तुझको  गायों संग केलि करूं मैं  खेतों की मेढ़ चढ़ाऊँ  पोखर का पानी भर दूँ  नालों में पनही बहा दूँ   चावल की पौध लगा लूँ गेहूँ को फसल मसल दूँ  सरसों की  भरी पितिका फ्योंली के फूल सजा दूँ  ताखे पर 'म्वारी' रख लूँ  पानी के जहाज उड़ा दूँ  तारों की साइकिल लेलूँ गावों में दुकान खोल लूँ मिर्च क्यारियां पानी डालूं  पालक की 'मरास' बोत लूँ  कट्घेलों से लकड़ी लेलूँ  भरी गागरी पानी भर दूँ  चावल कुटुं नाज कूट लूँ  बैलों को गेहूँ में घुमा दूँ  ककड़ी चोर गांव की खा लूँ  बंधी हुई बछिया को खोलूं  बान्दर हाँकूँ चिड़ी पकड़ लूँ  हर नीड का बैजा बदलूँ चुपके कुछ पत्थर रख दूँ  हर दिन उनको बढ़ता पाऊँ माचिस डिबिया भ्रमर बाँध लूँ  'डोकों' को मछली समझ लूँ  पैय्याँ के पेड़ों चढ़कर  फूलों की साख हिला लूँ  सावन के झूलें झू लूँ  पराली की रस्सी बना लूँ  'मोल्यों' की मिठाई परोसों  कच्चे ही पोलम खा जाऊ  फूल बुरांस का रंग बना लूँ  मिट्टी थ...