Posts

वो तु ही है

 वो तू ही है जो दर्द है अपनापन है  कमी है मन का शुकूं भी है  अँधेरे का रोशन दीया ढलती शाम का सहारा है  उम्मीदों के आसमान पर  चमकता सा सितारा है  और एक बात कहूँ  तू है सर का दर्द मेरा  तू ही है जो किताबों में है  आखरों में है शब्दों में है  पहाड़ों से समुन्दर में है  भावनाओं में कल्पनाओं में है  अधूरे से कुछ सपनों में है  साँस लेते हुए रिश्तों में है  बनते मकां और  उजड़ते विश्वाश में है  और एक बात कहूँ  तू भूत सी जगती रातों में है वो तू है जिससे नाराजगी सी है  वो तू ही है जो अपनेपन में है  मनाना है तुझसे रूठना है तुझसे  आस में तू विश्वास में तु चलती हुई सी सांसों में तु  बसती सी बस्ती है  उजड़ती ही हस्ती है  और एक बात कहूँ  तु जिन्न सी मेरी सांसों में है  वो तु ही है जो हमसफ़र है  रुलाता है हसाता है  पहाड़ों का इंद्रधनुष  और रेगिस्ता  सी मृगतृष्णा है  दुनिया में सबसे खास मन का अभिमान है तु  लड़ूँ तो चैन नहीं न मिलूं तो शुकूं नहीं ...

सोचकर स्नेह

 होती नहीं तय मंजिलें  कुछ रास्ते दिखते नहीं  ये सोचकर स्नेह  कभी कम हो नहीं सकता हो  बात तानों की  या नाराजगी साथी  ये सोचकर स्नेह  कभी चुप रह नहीं सकता  हो बात लम्बी सी  या गुमशुम रहे साथी  ये सोचकर स्नेह  कहीं खो नहीं सकता  हो रात मिलन की  या मन बिछड़ चलें साथी  ये सोचकर स्नेह  कभी मर नहीं सकता  हो समय साथ चल लो  या जी लो दो भर सही  ये सोचकर स्नेह  कभी दब नहीं सकता 

याद बहुत आते हो

 जब शब्द कम हो जाएँ  और भावना दब जाये  तब याद बहुत आते हो  एकटक देखा जाये  नज़र झुकी जो उठी है  ह्रदय कुलाचें खाये  तब याद बहुत आते हो  जब खुशबू छूकर जाये  घर का कोना खाली कदम रुके न जाएं  तब याद बहुत आते हो  जब रुक जाये परछाई  स्पर्श रहा सहमा सा  कोमलता पास न आये  तब याद बहुत आते हो  जब घोर अँधेरा छाये  रातों रात जगा है  मन खाली दर्पण है  तब याद बहुत आते हो  जब सूनापन लगता है 

ख़ामोशी से

 अहसासों की एक किताब है  तेरे मन में दबी हुई  मैं जब पढ़ता ख़ामोशी से  निशब्द हुआ सा जाता हूँ  रोक रही हैं सांसे  मन तुझ ही जाता है  खुशबू घोल मिली तन में  बादळ सा इतराता हूँ  जादू की एक बानी है  तेरे संग में बही हुई  आलिंगन ख़ामोशी से  बेसुध हुआ सा जाता हूँ  खींच रही हैं बाहें आस तुझी तक जाती है  नदिया समी मिली तन में  कोपल सा खिल जाता हूँ 

अपनेपन का पूरक

 अनदेखी की पीड़ा का एक उदाहरण हूँ  हर पल पर जो तुला गया  उस स्नेह का मापक हूँ  छंदों गीतों को अपठित कविता  अधूरे रिश्तों की परिभाषा हूँ  तुझमें समता जीवन तेरी सांसों पर जिन्दा हूँ  बहती सी एक दरिया का ठौर ठिकाना हूँ  हर पल पर जो भुला गया  उस अहसास का आशय हूँ  रंगों चित्रों की अनदेख पहाड़ी  अधूरे रास्तों की मंजिल हूँ  तुझमें समता जीवन तेरी सांसों पर जिन्दा हूँ  खोटी हुई एक भटकी सी मृगतृष्णा हूँ  हर पल जो तका गया  उस सोच सा सिमित हूँ  शब्दों सोचों की बंधी भावना  अधूरे अपनेपन का पूरक हूँ  तुझमें समता जीवन तेरी सांसों पर जिन्दा हूँ 

समर्पण सादगी का है

 जी भर बात करता हूँ  हर रोज आईने से मैं  चुपचाप उससे ज्यादा  किसी ने सुना भी तो नहीं  लिख देता हूँ हज़ार ख़्वाब हर रोज़ डायरियों में  खामोश उससे ज्यादा  किसी ने पढ़ा भी तो नहीं  जगता हूँ रात भर  हर रोज़ चांदनी में  एकटक उससे ज्यादा  किसी को निहारा भी तो नहीं  अनगिनत आशाएं मन की  हर रोज़ सपने सजता हूँ  चुपचाप उससे ज्यादा  मन ने किसी को माना भी तो नहीं  बहा है संग दरिया सा  हर रोज़ नहाया हूँ  सरोबोर उससे ज्यादा  किसी के संग भीगा तो नहीं  समर्पण सादगी का है  हर रोज़ एक तपस्या है  ध्यान लगाकर उससे ज्यादा  कुछ माँगा भी तो नहीं 

आप

तुझे बांध कर रख दूँ ये ख्वाईश कब है मेरी,  मैं स्नेह का बधा धागा हूँ मजबूरी का सूत्र नही हूँ मकाम तुझे तय करने हैं मैं मंजिल तक बढ आया हूँ टूटती बिखरती पगड़ंड़ी हूँ तयशुदा रिश्ता नही हूँ.... सफर लम्बा है अपना  कभी डूबता बढ़ता सही आस का क्षितिज तकता हूँ समय की कोई सीमा नही हूँ रेखाऐं ले जाती हैं तुझतक यूँ तो भाग्य का भरोसा नही पाना खोना तुझपर छोड़ता हूँ छोड़ दूँ जिद ऐसा बचपना नही हूँ

जमीं मेरी

 दरकता सा पहाड़ हूँ  खिसकती सी जमीं मेरी  बहूँगा संग नदिया रे ! मेरा अस्तित्व ताखे है  हिमालय से रहे सपने  पिघलती सी जमीं मेरी  चमकूँगा संग रौशनी रे ! मेरा रोशन अँधेरा  है  बढ़ता सा शहर हूँ मैं  घटती सी जमीं मेरी  जानूँगा संग दर्पण रे ! मेरा धुँधला सा दर्शन है  छिटकती शाम सेहरा की  ढलती सी जमीं मेरी  अपनाऊँ संग समर्पण रे ! मेरी पहचान तुझ तक है 

रूह की गाँठ

 कुछ अनजान रिश्तों में  रूह की गाँठ होती है  वही फेरे चुपचाप होते हैं  वहीँ सिन्दूर रचती है  कुछ फैले से सामान में  चीजें अनमोल होती हैं वहीं मन चुपचाप मिलते हैं  वहीं प्रणय की रात होती है कुछ अनकही सी बातों में  समझ गहरी सी होती है  वहीं सूनापन सा रहता है  वहीं तेरी कमी सी रहती है  कुछ अपठित शिलालेखों में  दुनिया दबी सी होती है  वहीँ एक कारीगर होता है  वहीँ एक सोच जगती है  कुछ सुनसान राहों में  मंजिल अज्ञात होती है  वहीं अपनापन सा होता है  वहीं एक शुरआत होती है  चलाचल सफर में राही मुझे दुनियां बसानी है  मैं जीवन भर तकूँ जिसको  वहीं मंजिल बनानी है

बहूँ संग में

 लहरों  से अपनी लौटकर आ  मैं बिखरा हूँ रेती किनारे तेरे  आगोश में ले भींगो ले मुझे  मैं कण कण बिखरता बहूँ संग में  खुशियों से अपनी सिमटकर के आ  मैं फैला हूँ गठरी को खोले तेरे  आगोश में ले समाकर मुझे  मैं पल पल सिमटता रहूँ संग में  जड़ों से अलग तू खिसककर के आ  मैं जमता हूँ मिट्टी पकडे तेरे  आगोश में ले छुपाकर मुझे  मैं क्षण क्षण रगंता रहूँ संग में  शाम ओ शहर रात कटती नहीं  कदम दर कदम इस सफर संग में