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कल्पना की वास्तविकता

 एक आधा अधूरा चिंतक होने के नाते कई बार सोचता हूँ की क्या कल्पना में कोई  वास्तविकता छुपी हुई है । क्या कल्पना से वास्तविकता का जन्म हो सकता है। आखिर कल्पनायें हैं क्या ? सिर्फ मन की गूढ़ता या किसी यथार्थ का चिंतन।  कल्पनाओं के झाड़ पर बैठकर कई बार कविता का सृजन करते समय मुझे लगता है की क्या कल्पना मानव मन की सृजनशीलता की पहली कड़ी है। क्या कल्पनाएं झूट का पुलिंदा मात्र हैं और  सत्य सदैव अपरिवर्तनीय होता है या फिर कल्पनाओं में भी जीवन का एक सार है , एक गूढ़ता है और एक रचा बसा संसार है ?  कभी कभी मस्तिष्क मन में बनीं कुछ सोचों, कल्पनाओं या  छवियों का मूल्यांकन करता है जिन्हें वह संसाधित करना चाहता है , कल्पना वास्तविकता की सीमा का आधार सा लगती है । यदि कल्पनाओं के संकेत सीमा पार कर जाता हैं , तो मन  सोचता है कि यह वास्तविक है यदि ऐसा नहीं होता है, तो मन  सोचता है कि यह काल्पनिक है। काल्पनिकता कभी कभी यतार्थ को जन्म देती सी लगती है । जान तक मन विचार शून्य है तब तक न कल्पना का आधार है न वास्तविकता की परिधि।  वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कल्...

हस्ताक्षर

गंगा की पावन धारा में एक गोता खाकर आया हूँ हरसिंगार के फूलों की खूशबू में घुल आया हूँ सांसों में सांसे देकर कुछ पल जीकर आया हूँ मैं स्पर्शों के अहसासों  पर हस्ताक्षर कर आया हूँ कोमल से कुछ फूलों की पौध रोप कर आया हूँ धरती में जो बीज पडें थे उन्हे जगाकर आया हूँ स्मरण की आयामों का मन चित्र साथ में लाया हूँ मैं स्नेह की गुफाऊ  पर हस्ताक्षर कर आया हूँ कविता की कुछ नई पंक्तियां शब्दों में लिख लाया हूँ समर्पण की वही कहानी गहरी दोहराकर लाया हूँ सपनों के ताने बानों को थोडा गहरा करके आया हूँ मैं स्पर्शों के अहसासों  पर हस्ताक्षर कर आया हूँ

वृतांन्त

कौन सका है बाँध वो खुशबू कौन पवन को रोक सका गुलमोहर से भरे रास्तों पर कौन तुझे कब भूल सका यादों की कविता लिखती है दिन वो कौन अजान रहा कौन समय जब दूर हुए हम कौन समय अहसास जगा कौन समय ठंण्डी काफी का कौन समय गरमाहट थी कौन समय वो हरियाली और कौन समय आगोश बसी देखो बढते से इन रास्तों पर कब समय मिले कब मंजिल हो चलते रहना साथ मुसाफिर कौन कहाँ कब सांस थमे

मन महाभारत

कोई आँख लगे ही सो जाये  कोई रात रातभर जग जायें कोई वक्त मिले पर बात करे  कोई वक्त वक्त पर बात करे कोई सिमटी दुनियाँ रखता है  कोई फैला आकाश समाये है कोई जीवन संग में बाँध चला  कोई अब भी डामाडोल लगा वक्त सभी का जबाब लिए  मन सबका हिसाब लिए तेरे मन की तु जानें  मैं जौहर आग लगाये लगाये हूँ या कि अब रणभेदी है  या साथ समर्पण हो जाये तेरे मन की तु जाने  मैं अर्धसत्य चक्रव्यूह लडूँ तु तटस्थ रह बलदाऊ सा  मैं एकपक्ष महाभारत लडूँ

दक्षिण काली फौली वाली

फौली का स्यणुं की,  फौली का कोठियालों की फौली का शुक्लौं की जय महाकाली जय माँ दक्षिण काली जय माँ दक्षिण काली देवी देविधार की दस विध्या शक्ति की महाकाल प्रियतमा बामरूप ऊष्ठि ह्वेयी फौली का स्यणुं की... कृष्ठ रक्त रूपों मा अधिष्ठित ह्वेयी कृष्ण रुप दक्षिणा रक्त वर्ण सुन्दरी फौली का स्यणुं की... कराली विकराली उमा चन्द्ररेखा चित्ररेखा  एक जटा त्रिजटा  तारा यक्षिणी ह्वेयी फौली का स्यणुं की... केदार घूमी की ऐयी गौं गौं देवरा जैयी आशिष सुफल पाये जन जन धन्य ह्वेयी फौली का स्यणुं की...

जब भीगी थी

जब भीगे थे बारिश में  क्या याद हमारी आयी थी 'खन्दार' भरे कमरे में  क्या याद हमारी आयी थी सावन झूले पतझड  बोर आम पर आयी थी कलियां केसर बेल नवेली तुलसी घर सज आयी थी जब औढीं थी साडी नीली क्या याद हमारी आयी थी सरसों से पीले खेतों में  क्या याद हमारी आयी थी खाली खिडकी रस्ता देखे  नजर गढायें बैठी थी  बहता पानी सूखा झरना  हरी डाल खिल आयी थी जब भीगी थी पलके गुमशुम क्या याद हमारी आयी थी छाता औढे भीग रही जब  क्या याद हमारी आयी थी

क्वे दिन

क्वे दिन उकाल देखि क्वे दिन उन्द्वार पायी ख्वोयी बिसरी हरची क्वे दिन जग्वाल बिनसरी हो रतब्यणि हो हो द्वोपरी भरमार  सजी धजी थामी जापी  क्वे दिन अकाल  क्वे दिन उज्यालू देखी क्वे दिन घम्माण ऊखरू भक्वरू जागी तापी क्वे दिन खच्याट 

अर्ध कहानी

सुनी हैं मैने अर्ध कथाऐं  सीखी हैं कुछ कलाऐं भी मैं संग्राम लडूँगा पूरा ही इतिहास रचाकर जाऊँगा अभिमन्यु सा कूद पडा हूँ चक्रव्यूह सब सजा रहे मैं कोशिश करूगा पूरी ही अब बचन निभाकर जाऊँगा मै रणभेदी की अजर गर्जना तु समर्पण का उत्ताप रखे मैं निकल पडा हूँ  पूरा ही तु मंजिल पर बस साथ रहे

साथ तेरे

जीवन चक्र बदला देह की कुरूपता तक जन्म को फिर मृत्यु तक पाप का सहगामी बनाकर दर्द के उत्थान में रक्त के बहाव में  समर्पण की आग में हाँ मैं दोषी हूँ तेरा  वक्त के हर पडाव पर साथ की लालसा में  खुशी की आस में ठहराव है बस तु मेरा  कल्पना के मकाम पर  क्षितिज के छौर पर समुन्दर की रेत पर   कठिनाई के आकाश पर  हाँ मै साथ हूँ तेरे तुझमे खुद को घुल जाने तक

कुछ

एक गीत लिखूँगा साथ तुम्हारे एक किताब लिखूँगा यादों की कोमल से अहसासों की कुछ बात लिखूँगा वादों की कुछ होंगी अपठित कविताऐं एक कहानी जीवन की  कुछ रेल बजारी कपडों की कुछ पानी बहते बाँधों की कुछ भीडों में उठती पलकें कुछ गुस्से से मुड जाने की  कुछ हाथों में हाथ थामती कुछ हाथ छटककर जाने की कुछ गले लगाती खुशियों की सब में सब घुल जाने की