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प्रतीर पर रहा

ग़ैर ही थे ग़ैर ही रहे  बहती नयार का तय था रास्ता भी  प्रतीर पर छपछपाना  आरज़ू नही स्वभाव रहा  साहिल उम्मीदों की रही न रही मनों के तार बँधते रहे  कहने को बहुत था मनो के मूक संदेश चुपचाप पहुँचते  रहे  शुरु कोई कर न सका ख़त्म सब हो न सका  जताने को बहुत था  एकाकी मनों के अहसास  गुमनामी मे बढ़ते रहे 

रात परेशान है

रंगीन हो गये हैं जो जहां अपना बेरंगकर  ख़ुशियाँ बिखेरने वाले अब ख़ानाबदोश हैं  महफ़िलों की भीड़ में हर शख़्स तन्हा है  अपनेपन के मुखौटों वाले अब नदारत हैं  पहाड़ों की उतरती धूप में  अलसायी सी बेल है सौंधी ख़ुशबू लिए वो बरखा विहीन है आँखें करती इन्तज़ार हैं थकी हुई एक शाम में धूप पहाड़ों की चढ़ने को है  और रात फिर परेशान है 

सर्वस्व

कुछ बातें अधूरी   छोड़ना ही अच्छा  कुछ ख़्बाव अधूरे  ही रखना अच्छा मैं मुतमइन था  हर  अनकही बात पर कुछ बातों को मन  में रखना ही अच्छा  कुछ सीमान्त दायरों  में  बँधना ही अच्छा  कुछ निष्कर्षों पर  न पहुँचना ही अच्छा  ये तय था हर  मक़ाम पर ऐ! ज़िन्दगी  कुछ यूँही पा जाना  फिर सर्वस्व हार जाना 

चुपके कुछ कहा नही

यूँ तो भूलने के कगार पर  वो रास्ते जिनपे चला नही वो डगर रही खामोश ही  जो साथ थी बड़ी नहीं  यूँ तो दूरियों का गिला रहा वो दरिया पास आया नही  वो ग़ुबार जो उठता ही रहा कभी मन की सीमा में बहा नही  वो सच्चाई का यूँ आलम रहा  कभी झूठ साथ चला नही   यूँ तो ठौर पर ही रहा मगर  कभी चुप के कुछ कहा नही.  

कहीं कुछ

किसी किनारे पर कोई  कमी अब भी लगती है  काग़ज़ों के बीच उठती कई नज़र अब भी तांकती हैं  कदम दौड़ते तो बहुत हैं सहमे पदचापों की आवाज़  अब भी सबकुछ रोक देती है  किसी किनारे पर खामोश  कोई  साँस अबभी तेज़ बढ़ती है  बोल न पाऊँ सामने जिसके  वो आवाज़ खोई सी लगती है  बात तो सबसे होती है बहुत ख़ामोशी मे जो सब बोल जाय उस परिन्दे की कमी सी लगती है 

रहे न रहे

कसौटी पर खरा उतरूं न उतरूं कोशिशों का दौर जारी है मन होता नहीं की थक जाऊँ उम्मीद इसकी भी है उसकी भी कहीं पहुँच सकूँ या न सकूँ कदमों का चलना जारी है मन होता नहीं कि रुक जाऊँ मंजिल इसकी भी है उसकी भी मनाना रूठना रहे न रहे किसी कोने में कुछ तो है मन होता नहीं कि भूल जाऊँ आस मेरी भी है उसकी भी

वो किरण

वक़्त तो मिजाजी था कब किसका हुआ  कल तेरे साथ था  अब पराया हो गया  बदलता पन्ना कब रहा कहानी के कथानक में पहले चित्र उभरता था अब परछाईं रह गया  यादें कब किसकी हुई जीवन की दौड़भाग में  पहले हरदम मुँह में था  अब मन में अकेला रह गया  तु भी मेरे पहाड़ों सा है मन मे है पर दूर ही रहा हिमालय की वो  किरण जहाँ रोशन तो कर गयी 

दो छौर

वो दीवार पर चिपका रहा  कि पत्थर ही बन गया हो  अमूर्त सीने की वो धड़कन  साँसों की गहराई नापती है  वो नज़र झुकाये ही रहा  कि मूर्ति सा बन गया हो  काँपते अधरों की बैचेनी  सदियों के इन्तज़ार सी है  वो दूरियों मे ही सदैव रहा  आँखों या अपनेपन की हों निहारती पलकों की थकन उस नदी के दो छौरों सी है 

जब सोचना

जो बैठकर सामने  रोया था कभी  अब अकेले में  सिसकियाँ लेता होगा स्नेह और सम्मान की  कुछ बातें तो होंगीं  जिन्हें अकेले में सोचकर  गुनगुनाता होगा  वो जो झूठ सच के जालों मे उलझा रहा हरदम जब अकेले में  अब सोचता होगा चुभी तो होंगी कुछ बातें कुछ मन मे घर कर गया होगा भूले बिसरे ही सही होंठों पर कुछ हँसीं लाता होगा 

तु जैसा है

तु श्याम रंग ही अच्छा है  मन पर चढ़ सा जाता है  धवल चाँदनी से धूमिल  श्वेत चमक चौन्धियाता हैं  तु दीप जलाये ही अच्छा है रास्ता सच्चा दिखलाता  है  झूठ की बुने लाखों जालों में बस पाक पवित्र सा लगता है  तु जैसा है वैसा अच्छा है  सीमित शब्द सा लिखता है  गुमसुम तेरे स्पष्ठ संन्देशो में  कुछ अपनापन सा लगता है