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ज़िद है

तुम भी चुप हो हम भी चुप हैं बात कोई निकली ना जाय  मन पर छाया रहा जो हरदम  मन से दूर निकाला न जाये  ख़ामोशी का आलम ये है  बात निकलती लिखी न जाये देख रहें हैं एकटक हम तुम  सब कुछ स्थिर चटक न जाये पहल कहीं से शुरु न होती बात कभी विराम तक न पहुँची  तुम भी तुम रहे हम भी न बदले ज़िद है सबकी अपनापन जताने की 

लाम पर रहे

बदलता तु भी नही  बदलता मैं भी नही  कशिश दोनों तरफ कहता कोई कुछ नही  चल कुछ ऐसा करें की वो जिन्दणी बचे तु तु रहै मैं मै बनूँ  अरमानों की एक याद रहें बुनते सपनों में उलझा  छन्द तारतम्य में न बदला जो पास लगे दूर रहे  मन वाले लाम पर रहे  शहर की बदनाम गली में वो था तो ही रौनक़ सी थी  स्याह सड़कों की शामों पर खामोश ! उदासी डराती रही 

अकेला तो है

यादो मे रहता अजनबी एक शूल सा चुभता है  तिल-तिल सताता तो है पर कभी कुछ कहता नही  जो देखता है मुड़के अक्सर  पर कहीं नज़र मिलाता नही  सोचता वो भी होता होगा  मगर कभी कुछ जताता नही  जो नज़रों मे है हरदम  ज़ुबान मे कभी आता नही  अकेलापन तो उसका भी होगा  साथ कभी कोई देता नही 

अजनबी

दूरियाँ में ख़ामोशी से स्नेह पलता है  ख़ामोशी मे कहीं कोई उन्माद रहता है पहल की कोशिश तेरी  होती नही  सोच तुझसे दूर कहीं जाती नही  गूँगे कब बोल पड़े सूरों की तान पर दुश्मन कब खड़े रहै अपनो के साथ में मनों से दूर  होता नही जो अजनबी  पास जाने की कभी कोशिश होती नही  अपनेपन सोचने को मजबूर करता है  विश्वास सब कुछ थामे से रखता है  जिसने अपनों मे गिना ना ओ अजनबी  रह रहकर सोच को घेर लेता है अजनबी 

तेरे प्रीत की

शाम की लौं पे दस्तक हुई थी कभी  टूटे द्वारों पे आहट हुई थी कभी  गीत बज्मों से निकली किसी पीड पर मैंने रच दी कहानी तेरे प्रीत की  खेत की मेंढ पर सिसकियों सी कभी अधखुली खिड़कियों पे तांकती सी कोई   झरने नदियों से निकली किसी आह पर मैंने रच दी कहानी तेरे प्रीत की  राहें तकती  कोई राहगर सी कभी  साख के ओट पर सुखती सी कोई  टहनी-पत्तों से निकली किसी ओस पर मैंने रच दी कहानी तेरे प्रीत की 

हर अहसास में

तु ‘बन्दगी’ भी में है मन मन्दिर में भी  उन बिछुड़े दोस्तों में उन सुखे बुग्यालों में हर शाम दस्तक देती मन्दिर की उस घंटी में तु दूर तांकती नज़र में तु पास रहती तन्हाई में किताबों के बीच कहीं  सुखी सी याद में  तु ही है अकेले का साथ तु ही हर अहसास में 

समय

कभी समय की मीनारों पर  अवशेष बना पाया खुद को रजमाटी में सम्मिलित होता बीज पड़ा पाया खुद को  दें न सकूँ कुछ त्याग जगत में बस जतन जुगाता कलरव हो तुम भी हो और मैं भी हूँ  बस अलग मंज़िल पर राह एक हो

प्रतीर पर रहा

ग़ैर ही थे ग़ैर ही रहे  बहती नयार का तय था रास्ता भी  प्रतीर पर छपछपाना  आरज़ू नही स्वभाव रहा  साहिल उम्मीदों की रही न रही मनों के तार बँधते रहे  कहने को बहुत था मनो के मूक संदेश चुपचाप पहुँचते  रहे  शुरु कोई कर न सका ख़त्म सब हो न सका  जताने को बहुत था  एकाकी मनों के अहसास  गुमनामी मे बढ़ते रहे 

रात परेशान है

रंगीन हो गये हैं जो जहां अपना बेरंगकर  ख़ुशियाँ बिखेरने वाले अब ख़ानाबदोश हैं  महफ़िलों की भीड़ में हर शख़्स तन्हा है  अपनेपन के मुखौटों वाले अब नदारत हैं  पहाड़ों की उतरती धूप में  अलसायी सी बेल है सौंधी ख़ुशबू लिए वो बरखा विहीन है आँखें करती इन्तज़ार हैं थकी हुई एक शाम में धूप पहाड़ों की चढ़ने को है  और रात फिर परेशान है 

सर्वस्व

कुछ बातें अधूरी   छोड़ना ही अच्छा  कुछ ख़्बाव अधूरे  ही रखना अच्छा मैं मुतमइन था  हर  अनकही बात पर कुछ बातों को मन  में रखना ही अच्छा  कुछ सीमान्त दायरों  में  बँधना ही अच्छा  कुछ निष्कर्षों पर  न पहुँचना ही अच्छा  ये तय था हर  मक़ाम पर ऐ! ज़िन्दगी  कुछ यूँही पा जाना  फिर सर्वस्व हार जाना