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खण्डित

नदी समुन्दर ताज घाट सब भरवा रोटी स्नेह निरन्तर नई स्नेह के आकृतियों में माँ ममता सब देहरी तुझ तक समय ताँकती लम्बी दुपहर छोटी छोटी मुलाकातों पर सुनसान मनों में पडी रही वो पीडा दुविधा खुशियां तुझतक दे आये सब निशां यादों के लम्बित लम्बे झगडे मन के  खण्डित हर्षित पुलकित मन की बची हुई सब सांसे तुझ तुक

धूप

ये वक्त अलग है कि वक्त नही है समय की दरिन्दगी में मन का वेग नही है आशाओं के आसमान पर एक तारा है बादलों के पीछे एक फैला आसमा है कोपल फूटेगी दरख्तों के साये से कल्पना के बीज गहरे गुमशुम तो हैं  ढलता ही सही फकत उजाला अभी बाकी है रात लम्बी है तो क्या सुबह की धूप अभी बाकी है

केदार

अन्नत में शून्य होकर  खुदकुशी के द्वार पर  सत्य को शिव से मिलाकर  मैं पार पाना चाहता हूँ देह भी तेरी रही सांस सब तुझसे मिली लाख लांछन मैं लिए बस गरल पीना चाहता हूँ मलंग सा फिरता रहूँ राह बस केदार हो छोड़ कर मैं जग सदा फिर शून्य होना चाहता हूँ

मौन

मौन मन की कल्पना के प्राण का अवसाद तय है स्नेह की क्यारी जगत में राख होना तय रहा है नद नदी बिहड़ कटे सब खाक होना तय हुआ है डूबता सूरज कहां फिर वो उजाला बन सका है टूटते तन मन बदन में मन ढेर होना तय रहा है बह गये सब वो किनारे तटबन्ध बाँधे जो डटे थे अब प्रलय सब साथ लेकर बढ चली सब ओर लहरे मैं मिलूँगा बस समुन्दर गर्द या फिर सीपि बनकर

मेरा है

खोया पाया जो भी है यश अपयश सब मेरा है किया कराया जो भी है आरांभ अन्त सब मेरा है कार्य अकार्य उपकार्य मेरे सारांश सार परिणाम मेरे कर्ण जना जो मेरा है अभिमन्यु मरा वो मेरा है यह कुरूक्षेत्र भी मेरा है जो जिया मरा सब मेरा है आदि अनादि अंहकार मेरा कर्म प्रभाव अंधकार मेरा जो राह चुनी वो मेरी है वो मंजिल अदृश्य भी मेरी है

आखिरी लक्ष्य

समर शेष का रण नही हो भीतर लडता द्वंद नही हो कुछ इच्छाईयां मरी नही हों त्याग समर्पण किया नही हो वो दीपक अधजले रह गये मन अंधियारा जिससे न मिटा हो तु साथ समर्पण करता आया देह निशा का त्याग कर गया जीवन मृत्यु साथ लिए तु जन्मों का कोई साथ दे गया तु मन का आखिरी लक्ष्य रह गया तुझ संग जीवन जीतता देखा

विश्वविद्यालय आवेदन या रोजगार के अवसरों के लिए संस्थागत जिम्मेदारियाँ:

 आजकल शिक्षण संस्थानों  की जिम्मेदारियां है कि वो विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रमाण पत्र, ट्रांसक्रिप्ट्स , रेकमांडेशन लेटर और शिक्षा तथा अन्य समाजोपयोगी कार्यों में उनके लेखे जोखो को उच्य शिक्षा संस्थानों या रोजगार प्रदान करने वाली कंपनियों को मुहैया करवाए।  कुछ शिक्षण संस्थाए उनमे बड़ी गोपनीयताये बरतती हैं जबकि कुछ काफी ट्रांसपेरेंसी।  यूँ तो दोनों पक्षों को देखा जाय तो दोनों सही हैं , वो जो छात्र को बिना बताये सीधे उच्य शिक्षा संस्थानों या रोजगार प्रदान करने वाली कंपनियों को भेज देते हैं , या वो जो स्टूडेंट्स हो दिखाकर या तो उन्हें देते है या सीधे उच्य शिक्षा संस्थानों या रोजगार प्रदान करने वाली कंपनियों को भेज देते हैं।   वो जो अपने पास सारे कागज़  गोपनीय तरीके से रखते हैं उनका मानना होगा कि स्टूडेंट्स कागज़ों के गलत उपयोग न कर दें या फिर वो उससे अपनी जिम्मेदारी मानते हों । दूसरी तरफ वो संस्थान जो स्टूडेंट्स के शैक्षणिक प्रमाण पत्र, ट्रांसक्रिप्ट्स , रेकमांडेशन लेटर और शिक्षा तथा अन्य समाजोपयोगी कार्यों में उनके लेखे जोखो को जरूरत पड़ने पर  स्टूडेंट...

तुझतक

शाम सुहानी रातें लम्बी अक्सर पूछा करती हैं सुबह सबेरे चढी दुपहरी  हाल मनों का कहती हैं सूना आँगन भरा हुआ है मन अन्दर तु बसा हुआ है शब्द सभी पहचाने तेरे  कविता गीत रचे सब तेरे घुल मिल गये वो शब्द हैं तेरे आयाम नये आदर्श हैं तेरे एक डगर बस जाती तुझतक सफर सुहाना मंजिल तुझतक तु आदि और अन्त है तुझतक आदि शक्ति! उम्मीदें तुझतक

समसामयिक विषयों पर चर्चा और कौशल निर्माण:

 समसामयिक विषयों पर चर्चा और  कौशल निर्माण: शिक्षा का स्तर यूँ तो पिछले २० ३० सालों  में बहुत बढ़ा है पर आज भी शिक्षा की उपलब्धता  और कौशल निर्माण में उतनी सफल नहीं है जितनी कि समय की मांग है ।क्लासरूम में  समसामयिक विषयो पर चर्चा का समय कुछ ही शिक्षा संस्थान दे पाते हैं जिसकी बड़ी वजह विषयवस्तु का भूत व्यापक होना है । ऐसे में शिक्षक या तो विषय वस्तु को ही पूरा कर सकते हैं या समसामयिक विषयों पर चर्चा कर या प्रयोगात्मक परिक्षण कर  कौशल निर्माण ही कर सकते हैं।  ऐसे में शिक्षक और  शिक्षा संस्थान करें भी तो क्या ?   समसामयिक विषयों पर चर्चा के लिए आजकल शिक्षा संस्थानों में फेस्टिवल ऑफ़ होप,  टेड एक्स , मॉडल यूनाइटेड , ड्रामा , थिएटर क्लब , पब्लिक स्पीकिंग कार्नर, पब्लिक फोरम डिबेट आदि कई ऐसे अवसर दिए जाते हैं तो स्टूडेंट्स को सोचने कि शक्ति और विचारों का खुलापन देते है । गंभीर विषयों पर सोच समझकर जब एक युवा अपनी बात रखता है तो  तो न सिर्फ उसकी बौद्धिक क्षमता बढ़ती है बल्कि देश दुनियां की दिशा और दशा का भी एक खांचा उसके मन में बन जा...

"न मातुः परदैवतम्"

 दुनियां मातृत्व और पितृत्व  प्रार्थमिकताओं के दो समाजों में बटीं हुई है। मनुष्य जीवन के पढ़ाई से लेकर अन्य सभी पहचान पत्रों में कहीं पिता का नाम लिखा जाता है कभी माँ का , कई दस्तावेजों में दोनों को नाम।  कुछ ऐसे भी दस्तावेज़ होते हैं जहा केवल एक ही नाम की जरूरत है , ऐसे में कौन सा नाम ज्यादा उन पहचान पत्रों में ज्यादा उचित है ये एक विचारणीय विषय है।  पिता की संपत्ति पर बच्चे के हक़ को बनाये रखने के लिए शायद ये उचित लगे की आदमी  की  पहचान के कागजों में उसके पिता का नाम लिखा जाय।  पर जिस तरह आज समाज बदल गया है , परिस्थितियां बदली हैं और  कई शादियां बहुत लम्बी  टिक नहीं पा रही हैं , ये देखकर लगता है कि बच्चे की पहचान सबसे ज्यादा माँ से है इसलिए ऐसे पहचान पत्रों में जहाँ माँ न नाम नहीं है वहाँ माँ का नाम लिखा जाना चाहिए । पितृत्व  प्रार्थमिकताओं वाले  समाजों में ये थोड़ा मुश्किल हो सकता है पर समय और काल की मांग यही लगती है।  यूँ तो माँ पिता में कोई तुलना नहीं हो सकती और  सामाजिक पहचान के लिए दोनों जरूरी  हैं पर जीवन पर ज...