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समय का सफर

सफर में भी मकां में भी शुकूं में भी परेशां भी  उदासी का सबब तुमसे मंजिल की बहर तुमसे खोना और पाना भी संकल्पों का समर्पण भी त्यागी हर बिरासत है अपनाया उसूं भी तु भेदों से विभेदों तक छुपा भी जो खुला भी सब समय की एक सीमा है कुछ दिन बस ठहर तु सब बादल जो वो बरसा है नदी फिर जो ऊफानों पर मेरे समुन्दर की लहरें हैं तु ही बस एक नाविक है

राख

साथ गहराता अन्धेरा हर समय चलता रहा मर चुका जो मन चिता की राख को मलता रहा पुण्य के कुछ काम जो अंशों में किये उधार हों अब फना हर उम्मीद हो साथ खामोशी रहे गुनगुनाऐं गीत जो कर्कश लगे गढते रहे मैं कल्पना के झाड़ पर धधकती सी आग हूँ जलता सा शहर हूँ विरान सा शमशान हूँ बरसों की लुकाछिपी और तन छोडता सा प्राण हूँ

चिताऐं

अब समय की दौड में कुछ हो अलग पहचान सी या कि रंगों के सरोवर या राख बदली रेत सी अग्नि कुण्डों में झुलस कर स्वाह हो अर्पण कभी कुछ चिताऐं शेष हों और मन मेरा औगण रहे लालसा बस शिव रहे और तु मृत्यु तक साधना मेरी

खण्डित

नदी समुन्दर ताज घाट सब भरवा रोटी स्नेह निरन्तर नई स्नेह के आकृतियों में माँ ममता सब देहरी तुझ तक समय ताँकती लम्बी दुपहर छोटी छोटी मुलाकातों पर सुनसान मनों में पडी रही वो पीडा दुविधा खुशियां तुझतक दे आये सब निशां यादों के लम्बित लम्बे झगडे मन के  खण्डित हर्षित पुलकित मन की बची हुई सब सांसे तुझ तुक

धूप

ये वक्त अलग है कि वक्त नही है समय की दरिन्दगी में मन का वेग नही है आशाओं के आसमान पर एक तारा है बादलों के पीछे एक फैला आसमा है कोपल फूटेगी दरख्तों के साये से कल्पना के बीज गहरे गुमशुम तो हैं  ढलता ही सही फकत उजाला अभी बाकी है रात लम्बी है तो क्या सुबह की धूप अभी बाकी है

केदार

अन्नत में शून्य होकर  खुदकुशी के द्वार पर  सत्य को शिव से मिलाकर  मैं पार पाना चाहता हूँ देह भी तेरी रही सांस सब तुझसे मिली लाख लांछन मैं लिए बस गरल पीना चाहता हूँ मलंग सा फिरता रहूँ राह बस केदार हो छोड़ कर मैं जग सदा फिर शून्य होना चाहता हूँ

मौन

मौन मन की कल्पना के प्राण का अवसाद तय है स्नेह की क्यारी जगत में राख होना तय रहा है नद नदी बिहड़ कटे सब खाक होना तय हुआ है डूबता सूरज कहां फिर वो उजाला बन सका है टूटते तन मन बदन में मन ढेर होना तय रहा है बह गये सब वो किनारे तटबन्ध बाँधे जो डटे थे अब प्रलय सब साथ लेकर बढ चली सब ओर लहरे मैं मिलूँगा बस समुन्दर गर्द या फिर सीपि बनकर

मेरा है

खोया पाया जो भी है यश अपयश सब मेरा है किया कराया जो भी है आरांभ अन्त सब मेरा है कार्य अकार्य उपकार्य मेरे सारांश सार परिणाम मेरे कर्ण जना जो मेरा है अभिमन्यु मरा वो मेरा है यह कुरूक्षेत्र भी मेरा है जो जिया मरा सब मेरा है आदि अनादि अंहकार मेरा कर्म प्रभाव अंधकार मेरा जो राह चुनी वो मेरी है वो मंजिल अदृश्य भी मेरी है

आखिरी लक्ष्य

समर शेष का रण नही हो भीतर लडता द्वंद नही हो कुछ इच्छाईयां मरी नही हों त्याग समर्पण किया नही हो वो दीपक अधजले रह गये मन अंधियारा जिससे न मिटा हो तु साथ समर्पण करता आया देह निशा का त्याग कर गया जीवन मृत्यु साथ लिए तु जन्मों का कोई साथ दे गया तु मन का आखिरी लक्ष्य रह गया तुझ संग जीवन जीतता देखा

विश्वविद्यालय आवेदन या रोजगार के अवसरों के लिए संस्थागत जिम्मेदारियाँ:

 आजकल शिक्षण संस्थानों  की जिम्मेदारियां है कि वो विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रमाण पत्र, ट्रांसक्रिप्ट्स , रेकमांडेशन लेटर और शिक्षा तथा अन्य समाजोपयोगी कार्यों में उनके लेखे जोखो को उच्य शिक्षा संस्थानों या रोजगार प्रदान करने वाली कंपनियों को मुहैया करवाए।  कुछ शिक्षण संस्थाए उनमे बड़ी गोपनीयताये बरतती हैं जबकि कुछ काफी ट्रांसपेरेंसी।  यूँ तो दोनों पक्षों को देखा जाय तो दोनों सही हैं , वो जो छात्र को बिना बताये सीधे उच्य शिक्षा संस्थानों या रोजगार प्रदान करने वाली कंपनियों को भेज देते हैं , या वो जो स्टूडेंट्स हो दिखाकर या तो उन्हें देते है या सीधे उच्य शिक्षा संस्थानों या रोजगार प्रदान करने वाली कंपनियों को भेज देते हैं।   वो जो अपने पास सारे कागज़  गोपनीय तरीके से रखते हैं उनका मानना होगा कि स्टूडेंट्स कागज़ों के गलत उपयोग न कर दें या फिर वो उससे अपनी जिम्मेदारी मानते हों । दूसरी तरफ वो संस्थान जो स्टूडेंट्स के शैक्षणिक प्रमाण पत्र, ट्रांसक्रिप्ट्स , रेकमांडेशन लेटर और शिक्षा तथा अन्य समाजोपयोगी कार्यों में उनके लेखे जोखो को जरूरत पड़ने पर  स्टूडेंट...