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पहाड घूमी औला

मल्टा खौला खटे खौला  कुछ नी होलु त जरा क्रिकेटे ख्येला चलदून भुला जरा पहाड घुमी औला ह्यू होलू हिवांल होलु  चला ग्योली भी होलू त डांडी कांठी द्येखी ओला स्याल होला तुतर्याल होला कुछ नी होला त बांदर घ्वडैं औला बाघ रिक्के डौर त भोत च पर चल जरा पण्डों देखी औला साग नी सग्वडी नी स्वाली नी पक्वडी नी पर चल जरा नब्ती बजे औला चलदून भुला जरा पहाड घुमी औला औली जौला च्वपता जौला केदार बद्री शीश नवोला कुछ नी होलु त गौ कू सिध्वे पूजौला चलदून भुला जरा पहाड घुमी औला

द्यू धुपणू

न द्यू रे न धूपणु रे पुरणी मूर्ती अर खडग नी रे कोठू बच्यू रे देवी कु म्योल माटा लिपे ह्वे न श्रृंगार बच्यू रे कूडा रैन मनखी नी रैन दार बच्या छन पर धूरपुल्यी उखिडिग्येन पूजा नी ह्वे पाठ नी ह्वे हरयल्यी नी बुतिन जौ नी लगेन म्योलौ मादेव कडकूडू ह्वेगी तब भी शक्ति बची रे पर स्थापन नी ह्वे कुल का देवत्यों आशिर्वाद रे पर कुल छितरेग्ये शंख हरची गडसों हरची कैन च्योरी नी के पर क्वजडी कुछ नी रे गौ रिता द्यूल रितू खौलू उखडी पठली सरकी ख्वोली पर रंग बानिश नी ह्वे न साज रेन न संस्कार रेन न अपणू स्यूं अभिमान रे गौ बच्यू रे पर बाटा सब्बी बदलिग्येन

तमाशबीन

राख होना ही कहाँ खाक मिल जाना है एक दिन जलती हुई चिता पर फिर भाप बन जाना है एक दिन इस समर में जीतकर भी सब हार जाना है एक दिन कुछ यतार्थ की नीव रखकर इतिहास बन जाना है एक दिन बोझ जिम्मेदारी का ढोहकर फिर अकेले रह जाना है एक दिन हसना है हसाना है  फिर तमाशबीन बन जाना है एक दिन

निशान

कुछ बस याद रहे काले से निशां रहे जन्मों और अजन्मों में कर्ण कोई कोई राम रहे कुछ आँखों से बह निकले कुछ घूँट गले में अटक गये बातों और खामोशी में जुडे कोई कोई बह निकले कुछ रूखे से बदन गये कुछ गदराये जख्म गये होश और बेहौशी में रोये कोई कोई चीख गये जन्म अजन्म की बात नही दुविधा मन की बह निकली साथ और समर्पण में बिछे कोई कोई पसर गये

तलाश में हूँ

पहाड के ढाल पर नदी का ऊफान हूँ पेड की छाँव में ढकी सी एक बौड हूँ चमकता सा हिमालय पिघलती सी बर्फ हूँ घने से जंगल में कुहरे की चादर हूँ गैहूँ की कोपल पर औंस की सी बूँद हूँ घर के पिछवाडे में नारंगी का पेड हूँ सर्दियों की सुबह में तकती सी धूप हूँ पहाड से बहाँ हूँ समून्दर की तलाश हूँ

खाली है

शून्य के शिखर पर आशाओं के उन्मादों से रची बसी एक दुनियां में सफर अकेले चलना है खाली पडे मकानों में खामोंशी के शोरों से सजे धजे बाजारों में मोल भाव खुद करना है रीते से कुछ बस्तों में डूबी यादों की नावों से सुनसान पडे चप्पों पर रोगन रंग फिर करना है फिर लिखना है गीत वही फिर शब्दों का संसार वही संघर्षो की जमी खडी है फिर चलना है राह वही

दूर कहीं

कुछ ख्वाब अधूरे रखे हैं धागें अभी बधें कब हैं  मिन्नतों के ताले खोले कुछ मन्दिर अभी पूजे कब हैं मन के सूनेपन में तु रीत गीत और प्रीत में तु शब्दों की इन पंखुरियो में थाल सजे सपनो में तु एक पहाडी गांव है तु टेढी मेढी सडक है तु दूर कहीं जो सफर चला है उस मंजिल का आगाज है तु

फिर रूठ जाती है

 वो रूठती है  सताती है  मानती, मान जाती है  और फिर रूठ जाती है  सजती है  बुलाती है  समझती, समझाती है  और फिर रूठ जाती है  जानती है  जताती है  अपना अपनाती है  और फिर रूठ जाती है  सिक्के हैं  पहेली है  मेरी बुनियाद तुझसे है  मेरी कविता मेरे गीतों  के अर्थों में समाहित है  जीवन है  की मृत्यु है  सभी का सार तुझसे है 

तो मुश्किल है

गुस्सा होंगें  तो मान भी जायेंगें रूठ जाएंगे  तो लौट भी आयेंगें बिखर गये  तो समेट लिए जायेंगे छूट गये  तो फिर मिल भी जायेंगें टूट गए  तो फिर मुमकिन नहीं  माला के रूद्राक्ष हैं औगण सा रूप है पत्थर सा मन  और मिट्टी सा स्वभाव है हिमालय की नदी  और पहाडों की बयार है बह तो गये हैं  फिर मिल भी जायेंगें टूट गये  तो फिर मुमकिन नही

आना तुम

कोई वो शाम हो जिसमें तुम्हारे साथ बैठें हों निहारे दूर से हिमला कहें कुछ बात चुपके से बुलाता हूँ पहाडों में कभी सब छोड आना तुम कभी जो आँख भर आये कभी मन कुछ अकेला हो मनों में प्रश्न अनगिन हो बुने मन ख्वाब चुपके से बुलाता हूँ पहाडों में कभी सब छोड आना तुम कभी सबकुछ अधूरा सा कभी सुनसान रातें हो खुद से हो गिला सिकवा या दुनियां के बहानें हो बुलाता हूँ पहाडों में कभी सब छोड आना तुम